हमारा गाँव जहाँ अब कोई नहीं रहता



गाँव के प्रधान जी का घर क्या आलिशान था। और बना भी गाँव के बीचों-बीच  बिलकुल समतल जमीन पर। पहाड़ों पर इस तरह की जमीन कम ही मिलती है ज्यादातर जगह उतार - चढ़ाव वाली ही होती है। मकान बनाने के लिए  बहुत कटान करना पड़ता है फिर जाकर समतल जमीन मिलती है और तब मकान बनाये जाते हैं।

प्रधान जी जिन्हें गाँव भी भाषा में पधान ज्यू कहते हैं। वे उस आलिशान घर में बड़े ही ठाठ - बाट से रहते थे। प्रधान जी का मकान था भी बहुत ही खूबसूरत तीन मंजिल का उनका वह मकान था जो ज्यादातर पत्थर और मिट्टी के गारे से बनाया गया था बाहर की ओर की पूरी दीवारों पर लकड़ी लगायी गयी थी जिस पर बहुत ही सुन्दर नक्काशी करी गयी थी। इतने खूबसूरत मकान तो आजकल देखने को भी नहीं मिलते रहने को तो दूर की बात है। 

प्रधान जी चार बेटे थे सब एक से बढ़कर एक होनहार और आज्ञाकारी। प्रधान जी के मकान को देखकर अपने गाँव के ही नहीं आसपास के गाँव के लोग भी आह भरते थे कि क्या कभी उनके पास भी एसा घर होगा। क्या वे भी कभी इतने सुन्दर घर में रह सकेंगे।

प्रधान जी के पास पैसों की कोई कमी नहीं थी उन्होंने अपने चारों बेटों को अच्छी शिक्षा दी पढ़ने के लिए शहर भेजा। पढ़ाई के बाद सब अच्छे पदों पर कार्यरत भी हो गये तो प्रधान जी ने सबकी शादी- विवाह भी करा दिये।

एक - एक सारे बेटे अपने बच्चों की पढ़ाई की बात कहकर अपने परिवारों को अपने - अपने साथ शहर ले कर चले गये। जब तक उनके बच्चे छोटे थे तब तक वे तीज - त्यौहार और छुट्टियों में घर आते रहते थे। जैसे-जैसे बच्चे बड़े होते गये उनकी पढ़ाई और अपने काम की व्यस्तता के कारण बेटों का घर आना भी कम हो गया। वक्त अपनी रफ़्तार से गुजरता रहा। बच्चों के घर ना आ पाने की वज़ह से प्रधान जी और उनकी पत्नी उदास रहने लगे।

वो आलिशान घर जहाँ कभी हर समय हल-  चल रहा करती थी जहाँ बच्चों की खिलखिलाहट गुंजायमान रहती अब हर समय सुना रहता। शायद यही सूनापन दोनों पति - पत्नी को अंदर ही अंदर खाने लगा तभी तो एक साल के अंदर में ही पहले प्रधान जी फिर चार महिने बाद ही उनकी पत्नी इस दुनिया को छोड़ कर चले गये। बेटे उनके अंतिम संस्कार में आये फिर उसके अगले दिन ही चले गये क्योंकि उनके पास समय ही नहीं था ज्यादा रुकने का। बेटे जाते समय मकान में बाहर से एक बड़ा सा ताला लगा गये।

अब उस आलिशान मकान में कोई नहीं रहता है धीरे-धीरे वह बंजर और उजाड़ होता जा रहा है क्योंकि अब वहाँ कोई नहीं रहता है।

यह दुखद कहानी एक कहानी ही नहीं बल्कि हमारे पहाड़ की हकीकत है। जहाँ गाँव-गाँव में आज हर दूसरे मकान पर एक ताला लगा हुआ है क्योंकि अब वहाँ कोई नहीं रहता है। बड़े-बड़े मकान जो कभी हमारी आत्मनिर्भरता के प्रतीक थे हमारी विरासत थे आज खंडहर में तब्दील हो गये हैं। ये एक हकीकत है और हमारा दुर्भाग्य भी की हम आज अपनी धरोहर अपने संस्कार और अपनी पहचान से दूर ही नहीं हुये बल्कि हमारे बच्चे तो अपनी जड़ों को जानते ही नहीं हैं तो वे अपनी धरोहर को कैसे बचा पायेंगे।

ये हमारा बहुत बड़ा दुर्भाग्य है हम अपनी जड़ों से कट गये हैं और हमारा पहाड़ अपने बच्चों के पलायन पर आँसू बहा रहा है 😔 😔 😔 धन्यावाद 🙏 

भावना भट्ट

Comments

Popular posts from this blog

आज की मांग

आखिरी अदालत

सुनहरी यादें