इंसान

          


एक शाम! शहर हम घूमने, 
निकले थे। 
एक तरफ थी झाड़ियाँ, 
एक तरफ शमशान थे। 
पैर तले एक हड्डी आई, 
उसके यही बयान थे। 
चलने वाले सम्हल कर चल, 
हम भी कभी इंसान थे।। 

श्वेता कर्ण...!! 
           

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