गुबार

भावों की महिमा है न्यारी ,
भांति-भांति की इसकी कहानी।
 प्रेम उद्गार प्यार बरसाता,
 प्रेम गुबार मन को खिलाता ।
 भावों की है महिमा न्यारी ।।
स्नेह भाव जब इसमें आता ,
सबको वह सिक्त कर जाता।
स्नेह लुटा दे जग भर में,
 गुबार इसका कम ना हो पाता ।
 तेरी मेरी बातें सुन,
  मन का गुबार बढ़ता जाता ।
   सुनकर जो इन बातों को ,
   दिल पर ना लेता ।
   मानव वह बहुत बड़ा,
    क्रोध ना उसका कुछ कर पाता ।
    क्रोध बड़ा घातक गुबार ,
    इससे बचना ना आसान ।
    क्रोधाग्नि में खुद भी जलता ,
    शब्दों से ज्वाला धधकाता ।
    बनती बात बिगाड़े जाता ,
    इस गुब्बार से बच कर रहना ।
    कर देता मानव का नाश,
     दिल में भरा बहुत गुबार।।


                    दिल की कलम सेे

                    मधु अरोड़ा
                    

Comments

Popular posts from this blog

आखिरी अदालत

आज की मांग

आवारा बादल (भाग 30) प्रयास