अहंकार



अहंकार का पुतला मानव,अपने ही धुन में रहता है। 
खुद को ही श्रेष्ठ समझ कर, सच को भी झुठलाता है।। 

दशा नहीं दिखता  उसको, बेबसी और लाचारी का। 
देता है साथ हमेशा , भ्रष्टाचार  बीमारी  का।।

हम - हम करके आगे आने को, अपना अहं बढ़ाता है। 
ऐसे में ही बड़े बुजुर्गों के, दिए संस्कार  भुलाता है।। 

गर अहं का त्याग करें हम, हाथ बढ़ा सहयोग करें। 
जीवन गति सत् पथ पर चलना, इसका सदुपयोग करें

क्षमा, दया, शीतलता, यदि यह गुण हम अपनाते हैं। 
अहंकार से नहीं, सदाचार से ही हम श्रेष्ठ कहलाते हैं।। 


श्वेता कर्ण

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