छुट्टियां

मोबाइल का दौर ना था ,
लूडो कैरम का जोर था ।
गर्मियों की छुट्टी के खेल प्यारे ,
बड़े निराले ,खुशी से भर देने वाले ।
सब मिलकर खेलते लूडो ,
बहन भाई संग लगतीबाजी।
 गोटियों के लिए होती छीना झपटी ,
 मेरी लाल तेरी नीली हरी ,पीली संग।
  मार चौकड़ी जाते बैठ,
  जीतने वाला शान से उठता।
   सब पर अपना रौब जमाता।
   घंटो तक हम खेल खेलते ,
   समय पंख लगा कर उड़ जाता।
    कभी शर्त लगा खेलते लूडो 
   अब भी हम बहन भाई 
   मामा -भांजा भांजी शर्त लगाते  खाने की
    आज कौन बनाएगा खाना 
     नए नए व्यंजन बनवाते
     हारने वाले की रेल बनाते ।
     जोड़ी में यह कट ना पाए
      घंटो अपना रंग जमाए।
      सब मिलकर आनंद उठाते।
      धमाचौकड़ी खूब मचाते।
      हारने पर कभी-कभी 
      लूडो लूडो पलट हम भाग जाते।
      लूडो का खेल हमें सिखाता ,
      जीवन जीने का पाठ बताता।
       मिलजुल कर रहना सीखलाता।
       लड़ झगड़ कर आगे बढ़ना,
        जीवन का आयाम बताता ।
        धैर्य रखना हमें सिखाता।
         शुरू में गोटी ना खुल पाने वाला,
         अंत में विजेता भी बन जाता। 
         ऐसा अद्भुत खेल निराला
         संयम धैर्य एकता का पाठ पढ़ाने वाला।।
                              दिल की कलम से
                              मधु अरोड़ा

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