आराधना


हे परमपिता, हे आराध्य मेरे
चरणों में सदा स्थान मिले ,
सागर की तूफानी लहरों में
तुझ मांझी की पतवार मिले ।।

मन भटक रहा मरीचिका में
माटी की कच्ची काया हूं,
परिस्थितियों के वश रही
छल प्रपंचों की नित छाया हूं ।।

सुनो, प्रार्थना रघुवर मेरे
सतमार्ग पर कदम बढ़ते रहें
मुश्किलों ,बाधाओं में 
हौसलें मुझे मिलते रहें।।

है याचना,, यही रघुवर
अधिकारों का न हनन सहुं,
मर्यादाओं में बंधी रहूं
नित कर्म पथ पर आगे रहूं
आराधना !! यही मेरी
सेवाकर्म अपना करूं !!!

जीतने को जग ये सारा
संघर्ष का नित पथ मिलें
त्याग कर स्वार्थ अपना
धर्म का प्रतिफल मिले !!

 स्वरचित, मौलिक
     कीर्ति चौरसिया
 जबलपुर (मध्य प्रदेश)

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