जीवन मृत्यु

जीवन लेता कौन, मृत्यु संग रखता मौन। प्रश्न यक्ष सा जटिल, लिए है काल कुटिल। हैं लंबे उसके हाथ, न देखे इंसानों की जात। पकड़ के ले जाता है साथ, किसी की सुनता एक न बात। वही तो चला चली है, बना जब काल बली है। रिश्ते नाते उम्र न देखे, पसंद किया जिसे चला है ले के। है ऐसा निर्दय कौन, मृत्यु संग रखता मौन। है ऐसी वो चीज, देख कर आती सबको खीज। सभी को गले लगाए, मुक्ति तन उसी से पाए। मौत को देख के आगे, जीव सब डर कर भागे। मगर तन कहाँ अजर है, मौत का खुला कहर है। जो जितना यहाँ पतित है, वो उतना अधिक व्यथित है। है जिसको थोड़ा ज्ञान, करे वह अपने प्रभु का ध्यान। उस काल के खाली होंगे भौन, मृत्यु संग रखता मौन। भूपेन्द्र डोंगरियाल

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