कागज के फूल

   
  क्यों बिताता अपना जीवन ,
   तू व्यर्थ ए मानव यहां।
    सीख ले कुछ सीख ले,
    कागज के फूल से यहां।
    माना के कागज के फूलों से,
    खुशबू कोई नहीं आती है।
     कागज बना छाल वृक्ष से,
     फूल की बनावट भाती है।
     मेहनत लगनसे भरपूर बना,
     रंग बिरंगे कागज से।
      रोजी का साधन है बनता,
      घर चला देता किसी का।
      तुझको भाया ,घर में सजाया,
      सिंगार तेरे घर का बढ़ाया।
      ड्रॉइंग रूम में वह रहता,
      आने वाले की नजर को भाता।
      अपनी तारीफ खुद करवाता ,
      सीख ले मानव तू सीख ले ,
      जीवन में हंसना,मुस्काना।
       दीन दुखी की सेवा करले,
       गुलदस्ते सा हृदय में बस जा।
       ऐसी सुंदर कर्म तू कर ले,
       कागज के फूलों से माना ,
       खुशबू नहीं है आती ।
       पर शोभा तो उसकी,
        हर एक के मन को भाती।।
                        दिल की कलम से
                        मधु अरोड़ा
                        

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