मन मंदिर


मन के मंदिर को रखे, करके  पवित्र।
तब  इस संसार में, महके बन कर इत्र।।

मन में पलते देखिए, नाना भांति विकार।
मन पर अंकुश राखिए, इसमें जीवन सार।।

कभी न पूरी हो सके, मन की इतनी चाह।
मन पर अंकुश राखिए, मिले सुहानी राह।।

तन को ही मत घोईए, घोओ मन का मैल।
रहे निरंकुश मन सदा, जैसे खुल्ला बैल।।

मन विकार भंडार है, इसका है यह ढंग।
पल पल में बदला करे, गिरगिट जैसा रंग।।

मन की गति से हो गये, कई बदनाम मनीष।
मन मतवाला इस तरह, जैसे कोई कपीश।।

 मन में राखिए, आप सदा स्नेह।
परिजन सब खुशहाल हों, अरु हो पावन गेह।।

श्वेता कर्ण

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