Posts

मैं और तुम

Image
मैं और तुम, मिल गए तो हो गए हम, मेरे जीवन का तुम आधार हो, हूं मैं काया,तो तुम छाया हो, मैं नदी की  एक धारा हूं, उस धारा में बहते हुई तुम एक नाव हो, हूं मैं तपती गर्मी, तुम शाम की ठंडी हवा हो, मैं कोमल सी एक फूल, तुम महकती खुशबू हो, मैं रात की घनी अंधियारी तुम खुबसूरत सा चांद हो, तुम्हारे साथ हर मौसम सुहाने  लगते  है, तुम्हारे रूठ जाने से होली के रंग भी फीके लगते हैं, जब मना लूं तुम्हे लगता है बहुत कुछ जीत ली, तुम्हारे साथ हम जहां की खुशियां पातें  हैं, तुम्हारा साथ हो तो मंजिल कितनी भी दूर हो पता नहीं चलता, तुम्हारे साथ चलते चलते लंबे सफ़र भी कम लगते हैं, तुम्हारे पास हम खुद को बड़ा महफूज़ सोचते हैं, हम ठहरे खुशनसीब इंसान और वजह तुमको मानते हैं, तुम्हारे बिना कुछ भी कभी सोच नहीं पाती हूं, कभी रूठ जाऊं तुमसे तो खुद ही रो पड़ती हूं, मेरे सागर जैसे दिल में तुम एक छोटा सा द्वीप हो, तुम्हारे साथ वहां एक खूबसूरत घर बसाना चाहती हूं, मैं तनाव,तुम राहत की वो सांस हो, मैं स्वादिष्ट एक पकवान,तुम उसमें नमक हो, मैं चलूं जिन राहों पे, उसके पास तुम वो बड़ा सा पेड़ हो, मैं जिस्म तुम...

आपने वादा तोड़ दिया

Image
मेरी शादी के बाद मेरी पत्नी सुधा अपने मैके आगरा गईं। उसके मैके जाते ही अपनी तो जैसे खाट खड़ी हो गई। एक एक पल काटना मुश्किल हो गया । घर में और कोई था नहीं । मम्मी पापा गांव में रहते थे और मुझे नौकरी के कारण शहर में रहना पड़ता था । शनिवार को मैं गांव पहुंच गया । शनिवार और रविवार तो ठीक निकल गये लेकिन सोमवार को वही सन्नाटा । मैं और मेरी तनहाई अक्सर ये बातें करते थे कि सुधा रानी तुम हो तो यह घर घर लगता है नहीं तो "रामसे ब्रदर्स" की डरावनी फिल्म का कोई खंडहर नुमा महल ।  जैसे तैसे सात आठ दिन निकल गये । हमने आव देखा ना ताव और छुट्टी लेकर पहुंच गये आगरा । उन दिनों में सुधा का भाई यानी हमारे साले साहब उसे लेने के लिए आते थे और हम अपनी ससुराल जाकर उन्हें लेकर आते थे, ऐसा रिवाज था । कोई फोन नहीं था केवल चिट्ठी पत्री का जमाना था । सुधा को मेरी चिट्ठियां बहुत पसंद आती थीं । थोड़ा साहित्यिक पुट हुआ करता था मेरी चिट्ठियों में । कुछ शेरो शायरी और कुछ शरारत । उसने आज तक संभाल कर रखी हैं वो सारी चिट्ठियां ।  हमको अचानक ससुराल में देखकर हमारी सासू मां एकदम से चौंक पड़ीं । एक मुस्कान और ...

खुशहाल परिवार की चाबी

Image
                          🏡 धर्मगढ़ नाम की एक सुंदर नगरी थी वहां पर लोग आनंद पूर्वक अपना अपना जीवन यापन कर रहे थे। वही, रणविजय जी का मध्यम वर्गीय परिवार भी खुशहाल जीवन व्यतीत कर रहा था। तभी उनके पड़ोस में गुरुशरण जी का परिवार रहने आया। वही पास के बड़े नगर में उनका बहुत बड़ा व्यापार था। वे बहुत संपन्न और समृद्ध परिवार से थे। पर उन्हें अपनी समृद्धि का तनिक भी घमंड नहीं था बड़े व्यवहार कुशल लोग थे। कुछ ही समय में रणविजय जी और गुरुशरण जी का परिवार आपस में बहुत घुल मिल गए दोनो परिवार अब एक परिवार की तरह रहने लगे, पर गुरुशरण जी को अपना मध्यमवर्गीय होना धीरे धीरे अखरने लगा और वो भी बड़े आदमी बनने की होड़ में दौड़ने लगे। और इस दौड़ भाग में उनका खुशहाल परिवार बिखरने लगा, पहले रणविजय जी अपने परिवार और बच्चों के संग उत्तम समय व्यतित करते थे पर उन्हें अब समय की कमी होने लगी पैसे तो उनके पास बहुत आ गए सुख सुविधाएं भी बढ़ गई, पर अब खुशियों में कमी होने लगी। अब रणविजय जी के बच्चें अपने पिता संग खेलने को तरसने लगे उनकी पत्नी पति ...

हम सब केवल भारतवासी हैं

Image
हमसब भिन्न भिन्न धर्मो के साथी। एक महान देश  राष्ट्र के वासी हैं।। ये हिन्दू मुस्लिम सिख ईसाई नहीं। हमसब स्वतंत्र भारत के वासी हैं।। जाति धर्म मत सम्प्रदाय अलग हैं। रह रहे देश में यहाँ के निवासी हैं।। त्यौहार भिन्न है पहनावा अलग है। हमारी ये एकता अच्छी खासी है।। एक दूसरे के धर्म का आदर करते। त्यौहार में घर मिलने भी जाते हैं।। प्रेम सौहार्द भाई चारे से हम रहते। एक दूजे के घर निमंत्रण खाते हैं।। हम पड़ोसी के सुख-दुःख में रहते। बेटी बेटों के शादी में भी जाते हैं।। बड़ी बीमारी एक्सीडेंट होते करते। जरूरत पर रक्त भी  देने जाते हैं।। भारत में रहने वाला  हर नागरिक। एक समान हर सुविधाएं पाता है।। रंग भेद नस्लभेद धर्म भेद न कोई। शिक्षा रोजगार व्यवसाय पाता है।। हर धर्म के लोग तरक्की करें यहाँ। जिसे जो पसंद है भाता खाता है।। साम्प्रदायिक सौहार्द बनाये रखना। हिंददेश ये भारत अपनी माता है।। इस स्वदेश से कभी घात न करना। इस मिट्टी में कफनदफन पाता है।। देश को धोखे देना न गद्दारी करना। जिस देश से जन्मों-2 का नाता है।। हमसब भारत के रखवाले कहलाएं। ये सौराष्ट्र हमारा है भारत माता है।। रचय...

युद्ध एवं शाँति

Image
जब बढा़ अहंकार मानव ने युद्ध रचाया। मानवता पर संकट छाया।। झोंक दिए जन युद्ध कुण्ड में। दावानल दहकाया।। हथियारों के व्यापारी ने । वक्त सुनहरा पाया।। तार तार होती अस्मिता। मृत्यु ने ताण्डव मचाया।। सूनी कोख माँग भी सूनी। समय ये कैसा आया।। अब हथियार छोडो़ कहे नारी । बहुत विनाश कराया।। शाँति की राह निकालो मिलकर। यही स्वधर्म कहाया।। स्वरचित मौलिक अप्रकाशित सर्वाधिकार सुरक्षित डॉ आशा श्रीवास्तव जबलपुर

तो वो यह सोचते हैं

Image
तो वो यह सोचते हैं कि, यह जो कुछ हुआ, उनकी बदौलत हुआ, कर्म मैंने किया और, नाम उनकी बदौलत हुआ। दुनिया को बता रहे हैं वो, अपने अहसानों को, सबको सुना रहे हैं वो, अपने कर्ज को मुझ पर। मगर,  बेकार समझकर कल तक तो, उन्होंने तोड़ दिए थे सारे रिश्तें, सड़ा हुआ फल समझकर, मुझको फैंक दिया था सड़क पर। और आज, उस सड़े फल में महक देखकर, हीरे के समान उसकी कीमत जानकर, बसाना चाहते हैं उसको अपने दिल में। बता रहे हैं अब, दुनिया को उसको, अपने खून से सींचा बाग, पीयें थे अपने आंसू - गम, उसको आबाद करने के लिए। कर रहे हैं अब मेरी तारीफ, दे रहे हैं मुझको सम्मान, मेरी सफलता और तरक्की पर, दुनिया से यह कहकर,  कि हमारे परिवार का अंग है। तो वो यह सोचते हैं कि शिक्षक एवं साहित्यकार- गुरुदीन वर्मा उर्फ जी.आज़ाद तहसील एवं जिला- बारां(राजस्थान)

वैराग्य पथ - एक प्रेम कहानी भाग ४४

Image
  प्रेम और निष्ठा मन का विषय है।जबरदस्ती कोई प्रेम पैदा नहीं कर सकता है। फिर प्रेम को निरूपित करने बाले बड़े बड़े नियम सभी अपना भी नहीं सकते। यदि उन नियमों को जबरन अपनाने के लिये बाध्य किया जाता है, उस समय  मन प्रेम की अवधारणा को और भी तेजी से तिलांजलि देने लगता है।     किसी स्त्री का किसी एक ही पुरुष से आजीवन प्रेम करना एक स्त्री प्रेम की सर्वोच्च अवधारणा है। तथा इस अवधारणा को जीवन में उतारना प्रत्येक के वश की बात नहीं है। सतीत्व और वैराग्य की अवधारणा प्रत्येक के लिये नहीं बनी हैं।     माना जाता है कि भारत में विधवा पुनर्विवाह की अवधारणा आधुनिक युग की है। पर यह सत्य नहीं है। प्राचीन भारत में भी विभिन्न जातियों और समाजों में विधवा स्त्री द्वारा पुनर्विवाह की परिपाटी थी। हालांकि ऐसे अधिकांश समाजों में विधवा का विवाह उसके दिवंगत पति के छोटे भाई से ही होता था। रामायण काल में भी वानर समाज तथा राक्षस समाज में यह परिपाटी मौजूद थी।     कभी अपने पति भक्ति के लिये असुर समाज में विख्यात रही रंभा अपने पति पातालकेतु के निधन के बाद उसके प्रेम मे...