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अखबार की सुर्खियों

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अखबार की सुर्खियों मे मेरा नाम चमक रहा था जिसे देखने को कब से मन तरस रहा था मेरी बड़ी सी तस्वीर के नीचे मेरा नाम दमक रहा था और मेरे नाम के साथ 'कवियत्री ऑफ़ दा ईयर' सज रहा था हर अखबार की सुर्खियाँ बस यही दिखा रही थी मुझे मेरे सपने से अवगत कर रही थी। मै जो निकली मौहल्ले मे कदम मेरे चल रहे थे सांसे मेरी दिव्यांग की भांति लडखडा रही थी अखबार लिये  हाथो मे थोड़ा आगे बढ़ी थी कुछ पडोस की औरते मुझे घेरे खड़ी थी। मुबारकबाद की झड़ि अभी लग ही रही थी एक के बाद एक बधाई ही रही थी। पीछे से दौड़ता एक बच्चा आया जोर से उसने धक्का दीया। जोर से फर्श पर आ गिरि स्वपन से बाहर आ पड़ी       कविता गुज्जर

परमवीर चक्र विजेता अल्बर्ट एक्का

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1947 का भारत ,आजादी के साथ साथ विभाजन का दंश भी। देश का विभाजन हो चुका था। पूर्वी बंगाल और पश्चिम में लाहौर,सिंध मिला कर एक नए राष्ट्र का गठन हुआ जिसे हम पाकिस्तान कहते हैं। लेकिन लगातार  सत्ता में पश्चिमी पाकिस्तान के लोगों का  वर्चस्व ,राजभाषा उर्दू को लेकर टकराव क्योंकि पूर्वी पाकिस्तान में बंगला बोली जाती थी उसे भी राजभाषा में शामिल करने को नकार दिया गया,आर्थिक सुधारों में भी वहां के लोगों की अनदेखी ,दमनकारी नीति पूर्वी पाकिस्तान के लोगों में आक्रोश भर रहा था। पूर्वी पाकिस्तान के साथ दोयम दर्जे का व्यवहार हो रह था। 6 दिसंबर 1970 में अवामी पार्टी के शेख मुजीबुर्रहमान भारी मतों से जीते ,लेकिन उन्हें बंदी बना लिया गया। बांग्लादेश के नागरिकों का लगातार भारत में पलायन हो रहा था।स्वर्गीय इंदिरा गांधी ने जब ये बात पाकिस्तानी हुक्मरानों से कही तो उन्होंने पल्ला झाड़ लिया ,ये कहते हुए की ये आपकी समस्या है। पूर्वी पाकिस्तान ने  मुक्ति वाहिनी सेना बनाई जिसे अप्रत्यक्ष रूप से भारत का समर्थन भी प्राप्त था। लेकिन पाकिस्तान ने एक बहुत  बड़ी गलती कर दी ,वो थी  भारती...

तुम्हें कुछ मिला न मुझे कुछ मिला

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तुम्हें कुछ मिला न मुझे कुछ मिला। मुझे जो मिला वो तुम्हें भी मिला।। कुछ भी कहे चाहे यह जग सारा। गाने को नगमा यह सबको मिला।। तुम्हें कुछ मिला न----------------।। किसने की बेवफाई, कौन वफ़ा इसमें हुआ। कितने बहे हैं आंसू तुम्हारे, कितना लहू मेरा बहा।। किसको मिला है ताज तख्त का,किसके सिर यह सेहरा हुआ। तोहफा यह तुझको न मुझको मिला,मुझे जो मिला वो तुम्हें भी मिला।। तुम्हें कुछ मिला न------------।। जिस मंदिर में तु दीप जलाये, उसकी दर पे सिर मेरा झुकना। मांगे मिन्नत तु जो वहाँ पर, विनती मेरी वहाँ यह करना।। जिस जन्नत में तेरा होगा महल, मुझको भी है बस वहीं बसना। खुदा यहाँ तुझको न मुझको मिला, मुझे जो मिला वो तुम्हें भी मिला। तुम्हें कुछ मिला न----------------।। हर ख्वाब किसका पूरा हुआ, हर जंग को किसने जीत लिया। किश्ती किसकी न डगमगाई,हस्ती का दीपक किसने मिटने दिया।। कौन नहीं है गुलाम यहाँ पर, आज़ाद किसने खुद को नहीं किया। चमन महका तुझको न मुझको मिला, मुझे जो मिला वो तुम्हें भी मिला। तुम्हें कुछ मिला न--------------।। रचनाकार एवं लेखक गुरुदीन वर्मा उर्फ जी.आज़ाद पता- ग्राम- ठूँसरा, पोस्ट- गजनपुर...

"वो ऐसा कैसे कर सकती है"

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तुम ऐसा कैसे कर सकती हो, छोड़कर हाथ मेरा गैरों की कैसे हो सकती हो। जिन आँखों में कभी थी तस्वीर मेरी, उन आँखों को तुम गैरों के ख्वाब सजा बैठी  कैसे अपनी खुशियों के लिए अपने मन की  कर बैठीं, तुम ऐसा कैसे कर सकती हो। मर्यादाओं में रहना तो एक नारी का गौरव है, त्याग दिया सहन शक्ति  में उसका वैभव है, छोड़कर सारी लाज शर्म तुम न्याय मांगती बाहर चाहरदीवारी के ,ऐसा कैसे कर सकती हो। अब जीने का तुम्हें अधिकार नहीं, यहसब करना था तुमको अंगीकार नही, जौहर की ज्वाला में जल जाती नारी तुम, इस ज्वाला से तुम दूसरों को संलिप्त कैसे कर सकती हो वाह वाह  हे पुरुष तुम आज क्यों धिक्कार उठे, जो मैने मर्यादा छोड़ी तो तुम क्यों चीत्कार उठे, जो मैने किया आज वो तुम युग युग से करते आए,कभी सीता का हरण , कभी द्रोपदी का चीरहरण करते आए, तब न तुम्हारी मानवता शर्मसार , तब न तुम्हारे ह्रदय में चितकार हुई, जब कभी मैने कहा तुम ऐसा कैसे कर सकते हो, बस यही कहा था तुमने यही पुरुषजीवन का श्रंगार है, पौरुष का आधार है। युगों से सही तुम्हारी मनमानी ,हमने तो नही कहा तुमसे तुम ऐसा कैसे कर सकते हो फिर आज क्यों हम...

शादी का लड्डू

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देखो भाई, ये वो लड्डू है जो पूरा खाया भी नहीं जा सकता और ना ही थूका जा सकता है🤭🤭🤭🤭 इसे तो जो नहीं खाता वो ही सुखी है🤗🤗🤗 क्योंकि जिसने खा लिया उसका तो भगवान भी साथ छोड़ देता है😱😱😱😱 भगवान भी कहने पर मजबूर हो जाते हैं कि जा भाई, अब तो तेरी रक्षा मैं भी नहीं कर सकता🥴🥴🥴 अब जो नहीं खाते इस लड्डू को वो दूसरों को बहुत ललचाई नज़रों से देखते हैं👀👀👀 सोचते हैं कि ये कितना सुखी है, जीवन में एक लाइफ पार्टनर हैं जो हर बुरे वक़्त में काम आता है🤒🤒🤧🤧 अरे दोस्त, तुम्हें नहीं पता कि लाइफ पार्टनर के आते ही बुरा वक्त शुरू हो जाता है🕰️ दि काउंट डाउन बिगिंस🕧 शादी के बाद आज़ादी से उड़ने वाले स्वच्छंद पंछी🕊️🕊️🕊️ अपने आप को स्वयं ही पिंजरे में कैद कर देते हैं और वो गाना है ना हमें दिल में बंद कर लो💕💕💕 और दरिया में फैंक दो चाबी🔑🔑 उस गाने पर अमल करना प्रारंभ कर देते हैं🤭🤭🤭 जब उस कैद से निकलना चाहते हैं तो अपनी फूटी किस्मत को रोते हैं कि चाबी तो गाना सुनकर दरिया में फैंक दी थी। अब ताला कैसे खोलें🔒🔒🔒 वैसे कुछ महान लोग इस लड्डू को पूरा निगलने की हिम्मत भी रखते हैं। शादी की...

दुनिया के रंग भाग ५३ - विश्वास

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  जिस संपत्ति की चाह में मनुष्य कोई भी अधर्म करने से नहीं चूकता, वह संपत्ति क्या उसके काम आती है। क्या उसे वह सुख दे पाती है। पागलखाने में वर्षों से रहती आयी स्त्री यही सोचती थी। अपनी पुरानी सोच पर अफसोस करती थी। पागल न होने पर वह स्त्री पागल होने का दंश भोग रही थी। हालांकि वह खुद कह सकती थी कि वह पागल नहीं है। वह साजिश का शिकार हुई है। उसकी अधर्म से अर्जित संपत्ति पर कोई और आनंद ले रहा है। पर शायद अब वह विश्वास करना भूल चुकी थी।    वह याद कर रही थी, उन दिनों को जबकि उसके पति ने उसे मानसिक रोगी सिद्ध कर पागलखाने में दाखिल किया था। वह संबंधित डाक्टर को सत्य बता रही थी। पर डाक्टर ने उसकी एक न सुनी। इलाज के नाम पर अनेकों पीड़ा दायक स्थितियों को उसने झेला।    क्या उस समय का संबंधित डाक्टर समझने में भूल कर गया था। लगता तो ऐसा ही है। वह भी यही सोचती थी। पर एक दिन जब उसने संबंधित डाक्टर को उसके पति से भारी रकम लेते देख लिया तब समझ गयी कि सब पैसे से खरीदे हुए हैं।    आखिर इसमें गलत भी क्या है। वह भी यही करती आयी थी। पहले अपनी रूप माधुरी से धनियों को रिझाती थी।...

अखबार की सुर्खियां

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"कॉलेज से निकलती हुई नाबालिग लड़की को चार लड़कों ने अग़वा कर किया बलात्कार"    अखबार की खबर पढ़ते ही शुक्ला जी के चेहरे के रंग बदल गए, ये उनके क्षेत्र में इस महीने होने वाली ये ५वीं घटना थी, उन्होंने किचन में नाश्ता बनाती हुई पत्नी को बोला  "अरे और कितना समय लगेगा ? देरी से गया तो विरोधी न जाने क्या-क्या प्रपंच रच लेंगे"     तभी श्रीमती शुक्ला जी आलू के पराठे और चटनी लेकर आ गयीं। "अरे उन तीनों को भी बुला लो नाश्ते के लिये, तुम्हारे साहबजादे तो अभी उठने वालों में से नहीं हैं"  शुक्ला जी ने अपनी धर्मपत्नी को बोला। "अरे वो तीनों भी १० बजे से पहले उठने वाले नहीं हैं,आप  नाश्ता करके के निकल जाओ"  पत्नी ने उनको चाय का कप देते हुए बोला। नाश्ता करते हुए शुक्ला जी ने ड्राइवर को जल्दी से गाड़ी निकालने को बोला। "धीरे-धीरे अब इनको संभालना मुश्किल हो रहा है, इस महीने ये ५वीं वारदात है"  शुक्ला जी ने गंभीर होकर पत्नी से कहा। "अरे आप चिन्ता मत करिए, ऊपर वाला सब ठीक कर देगा" श्रीमती शुक्ला उनकी ओर देखकर मुस्कुरा के बोली।          ...